दोस्ती के 30 साल!!
मोपेड फिर रुक गई!!
समझ नहीं आ रहा था कि इस बियाबान सड़क पर अब किधर जाएँ। गुलिस्ताँ कॉलोनी से इंद्रा नगर, बस इतनी-सी तो हमारी जर्नी थी। लेकिन उसे भी हम कभी दो दिन में पूरा करते थे, तो कभी "जॉइंट स्टडी" के नाम पर पूरा महीना खींच देते। रहना तो साथ ही था, भले ही दिन में दो बार बहस हो जाए। मगर मजाल है कि किसी तीसरे को इसकी भनक भी लग जाए! हमारी लड़ाइयाँ भी "इन-हाउस मैटर" हुआ करती थीं।
हाँ, तो यह बंद पड़ी मोपेड… दुनिया की नज़र में भले ही खटारा थी, लेकिन हमारे लिए किसी लग्ज़री कार से कम नहीं। वजह भी बड़ी खास थी। ड्राइवर को सड़क का उतना ही ज्ञान था, जितना हमें भविष्य का। और पीछे बैठा नेविगेटर पूरे आत्मविश्वास से ग़लत रास्ते बताता था। नतीजा यह कि गोमती नगर का फ्लाईओवर भी हमें पहचानने लगा था। वह पूरे आत्मविश्वास से रास्ते बताता था और नतीजा यह कि गोमती नगर के फ्लाईओवर पर घूमते-घामते हम दोनों हँसते हुए वहीं पहुँच जाते, जहाँ से चले थे। न कोई फ़िक्र, न कोई शिकवा। बस एक अफ़सोस रह गया , एम.बी. नॉवेल पढ़-पढ़कर पूरा विश्वास था कि किसी मोड़ पर एक लंबी-सी कार रुकेगी, शीशा नीचे होगा और हीरो कहेगा, 'मैडम, कहीं छोड़ दूँ?' अफ़सोस, उस दिन साहित्य ने वास्तविकता से हाथ मिला लिया और हम मोपेड ही धकेलते रहे। खैर… उम्मीद पर दुनिया कायम है। आज नहीं तो कल!
वे दिन भी क्या दिन थे! ट्रेनिंग करनी है तो साथ, खाना खाना है तो साथ, बाज़ार जाना है तो साथ। महज़ दो महीनों में कब हम इंसेपरेबल बन गए, पता ही नहीं चला। वह दिल्ली से ग्रेजुएट, हम आई.टी. कॉलेज के। बड़े और छोटे शहर के किस्से बाँटते-बाँटते एक-दूसरे की माँओं के भी चहेते बन गए।
क्लास खत्म होते ही पूरी टोली जम जाती और ठहाकों की ऐसी बरसात होती कि समय भी ठहरकर सुनने लगे। दो लड़कियों और दस लड़कों का वह छोटा-सा ग्रुप कोर्स खत्म होते-होते पूरे कुनबे में बदल गया। सच पूछिए तो उस उम्र में ज़िंदगी से ज़्यादा किसी चीज़ की ज़रूरत ही कहाँ थी! क्विज़ की तैयारी हो या जॉब मार्केट की चिंता, सब कुछ साथ-साथ।
पहली बार किसी को फोर्क से चावल खाते देखा। हमें लगा या तो खाने का कोई नया सरकारी नियम लागू हो गया है, या फिर हम छोटे शहर वाले अभी सभ्यता की अगली कक्षा में पहुँचे ही नहीं हैं। इधर मैं, जिसे कढ़ी-चावल हाथ से न मिले तो भोजन अधूरा लगे। हम दोनों उसे ऐसे देखते थे जैसे किसी विदेशी प्रजाति का दुर्लभ जीव देख लिया हो। गलती हमारी भी नहीं थी, आखिर सीमित दायरे में रहे थे।पेट में चूहे कूदते नहीं कि घर की याद आने लगती। कभी उसकी माँ के हाथ का स्वादिष्ट लंच, जिसमें मनुहार का तड़का सबसे अलग होता था, तो कभी इंद्रा नगर पहुँचकर अपनी माँ के हाथ की मिठाई। ईश्वर की कृपा थी कि हम दोनों अपनी-अपनी माँओं की छाँव में थे। उम्र बढ़ने के साथ समझ आया कि यह सुख हर किसी के हिस्से नहीं आता।
"ओह माय गॉड! यह तो ऋतु का बॉयफ्रेंड है… कितना हैंडसम!" बस, फिर क्या था! हमने भी मन ही मन कसम खा ली कि हमारा तो इससे भी बेहतर होगा। जैसे अच्छे लड़के किसी सुपरमार्केट की शेल्फ़ पर सजे मिलते हों! क्लास के लड़के तो हमें कभी योग्य उम्मीदवार लगे ही नहीं। विश्वास अटूट था कि हमारा ड्रीम बॉय मोटरबाइक पर आएगा। लेकिन इंटर्नशिप में किसी सहकर्मी की बाइक पर बैठने की नौबत आई तो संस्कार, सुरक्षा और संकोच, तीनों एक साथ जाग उठे। हम भी कितने फट्टू थे?
जॉब बाजार हम first year वालों ने organize किया तो वहाँ पर भी हमारी लोकप्रियता कम नहीं थी। एक साहब ने तो अपने दोस्तों से बाकायदा शर्त लगा ली कि अगर चार कदम साथ चल लिया तो प्रपोज़ कर देंगे… और उन्होंने अपना वादा निभा भी दिया। मेरा शर्मीला स्वभाव और मेरी सखी का बिंदास अंदाज़, दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत थे। opposite attract बड़ा फिट था यहाँ । वह तब भी बेहद आकर्षक थी और आज भी है। उसके बालों का स्टाइल, मीठी बोली और हर किसी की चिंता करने की आदत उसे सबसे अलग बनाती थी। उससे मैंने एक बहुत बड़ा गुण सीखा, अपने से नीचे काम करने वाले हर व्यक्ति को सम्मान देना और बिना किसी अपेक्षा के उसकी मदद करना। यह सीख आज भी मेरे जीवन की सबसे कीमती पूँजी है।
न जाने कैसा सुरूर था उन दिनों! थकना जैसे हमारी डिक्शनरी में था ही नहीं। लखनऊ की पॉश कॉलोनियों में रहने के अपने अलग ही सुख थे। बड़ी-बड़ी हस्तियाँ यूँ ही राह चलते दिख जाती थीं। शिवानी जी रोज़ शाम ठीक छह बजे छड़ी लेकर तेज़ कदमों से टहलने निकलती थीं। आज का ज़माना होता तो शायद उनके साथ सेल्फ़ी लेने की हिम्मत भी जुटा लेते। तस्वीर नहीं मिली, लेकिन वह दृश्य आज भी स्मृतियों में उतना ही स्पष्ट है। डाबर की चौड़ी, साफ़ सड़कों पर घंटों चलते हुए हम अपने सपनों की बुनाई करते रहते। सड़क किनारे खड़े यूक्लिप्टस के ऊँचे-ऊँचे पेड़ भी उन सपनों से छोटे लगते थे।
डिसर्टेशन लिखना और समय पर जमा करना किसी महाभारत से कम नहीं था। बहुत पापड़ बेले, लेकिन उन्हीं संघर्षों ने उन दिनों को यादगार बना दिया। बड़े अधिकारियों के बच्चों की प्रतिभा से लेकर उनकी असल ज़िंदगी तक का विश्लेषण करने में भी हम किसी खोजी एजेंसी से कम नहीं थे।
दूसरों की ज़िंदगी का विश्लेषण करने में हमारी दक्षता देखकर कई बार लगता था कि सीबीआई ने अगर हमें भर्ती नहीं किया, तो नुकसान उसका ही हुआ। फ़र्क बस इतना था कि हमारी सारी जाँच रिपोर्ट चाय और समोसे के साथ मौखिक रूप से ही प्रस्तुत होती थीं।
उस उम्र में उसे हम मनोरंजन कहते थे, आज समझ आता है कि वह हमारी आधी-अधूरी जासूसी प्रतिभा का अभ्यास था। क्रिएटिविटी तो जैसे जन्मसिद्ध अधिकार थी। कंपेयरिंग करनी हो, स्किट लिखनी हो या स्टेज सँभालना, हर जगह हमारी मौजूदगी तय रहती। एक बार स्किट का अंत हमने पूरे आत्मविश्वास से "म्याऊँ" करके किया। सीनियर हँसते-हँसते लोटपोट हो गए और मैं शर्म से लाल होकर शाम भर अपना चेहरा छिपाती रही। विडंबना देखिए, सबकी चहेती थीं, लेकिन बॉयफ्रेंड फिर भी नहीं बना! पिकनिक पर रिक्शे से जाना भी हमने पूरे गर्व से किया। और जिसने "आशा" को "आसा" कह दिया, उसकी ऐसी खिंचाई हुई कि आज तीस साल बाद भी वह हमारे ग्रुप में "आसा" के नाम से ही मशहूर है।
सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब क्लासें खत्म हुईं और असली ज़िंदगी ने दरवाज़ा खटखटाया। माँ-पिताजी ने साफ़ कह दिया, "जो करना है, यहीं करना। लखनऊ से बाहर नहीं जाना।" हमें क्या! हम तो अभी भी मटरगश्ती के मूड में थे। एक महीना यूँ ही निकल गया। फिर पिताजी ने अंतिम चेतावनी दी, "या तो नौकरी ढूँढ़ो, नहीं तो ब्याह कर देंगे।"
पिताजी का अल्टीमेटम भारतीय प्रशासनिक आदेश से कम नहीं था, 'या नौकरी ढूँढ़ो, या शादी।' हमने लोकतांत्रिक तरीके से पहला विकल्प चुन लिया और शाम तक दो ऑफ़र लेटर लेकर लौट आए। हद्द तो तब हुई जब , माँ बोलीं, “उनको भी अपने बातों के जाल में फँसा लिया “।
वे दो बरस… कैलेंडर के हिसाब से भले सिर्फ चौबीस महीने थे, लेकिन जीवन की किताब में पूरा एक सुनहरा अध्याय बन गए। आज उन्हें शब्दों में बाँधने बैठती हूँ तो उँगलियाँ बार-बार ठहर जाती हैं। लगता है, कागज़ छोटा पड़ जाएगा और यादें लंबी।
कुछ यादें लिख दी हैं, और न जाने कितनी अब भी मन की तहों में मुस्कुराती बैठी हैं। यह पिटारा छोटा ज़रूर है, पर इसकी कीमत किसी ख़ज़ाने से कम नहीं।
तीस साल बाद समझ आया कि दोस्ती की असली उम्र कैलेंडर से नहीं, साझा मूर्खताओं से मापी जाती है। जितनी बेवकूफ़ियाँ हमने उन दो बरसों में कीं, उतनी समझदारी शायद अगले तीस सालों में भी नहीं कर पाए। और हाँ… वह खटारा मोपेड अगर आज भी कहीं मिल जाए, तो यक़ीन मानिए, हम फिर उसी पर बैठकर रास्ता भटकने निकल पड़ेंगे। आखिर कुछ मंज़िलें पहुँचने के लिए नहीं, याद बनने के लिए होती हैं।
काश… इन तीस वर्षों में भी हम ज़िंदगी को उतनी ही बेफ़िक्री से जी पाए होते, जितनी बेफ़िक्री से उन दो बरसों को जिया था।
उम्र बढ़ती है… पर दोस्ती छोटी नहीं होती।
वह वहीं ठहरी रहती है,किसी बंद पड़ी मोपेड, किसी अधूरे रास्ते और दो खिलखिलाते चेहरों के बीच। और पाल कर रखिए तो ओल्ड वाइन की तरह चढ़ जाती है ।
मंजरी 💖 💖
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