मेरी कहानी ……
मेरी कहानी बड़ी आम है
हाँ किरदार उसमें कुछ खास हैं
चलो मिलाते हैं उनसे तुमको
क्या पता कोई तुम सा ना हो ?
चले थे हम आँखों में सपने लिए
सफ़र में बहुत योद्धा मिले
कोई ज़ख़्मी हुआ
कोई हुआ है शहीद
बचे जो बेचारे
वह आम थे …………
किसी ने कहीं झंडे गाड़े
किसी ने किसी के पांव उखाड़े
बस यही हो रहा था
सफ़र में मुसाफ़िरों का रेला लगा था
हुजूम में हम भी चल रहे थे
किसी के धक्के से आगे बढ़ रहे थे
राह में कुछ राहगीर मिले
उनकी अकड़ से हम जो हिले
कि मुस्तक़िल एक प्रश्न कौंध गया
तुम्ही थे जिसने टंगड़ी अड़ाई
फिर तुम ने मुझसे मिलने की
हिमाक़त क्यों जताई ?
चलते चलते क्यों थम गया था
ये कैसा सफ़र जो रुक गया है
ठहरे हुए धुएँ में दम घुँट गया है
सिसकियों को कौन सुन रहा है
फिसलन भरे रास्तों पर जो चल रहा था
पत्थरों पर कुछ जम सा गया है
किसी के कानों में ना कुछ गड़ रहा है
इसी को कहते हैं ज़िंदगी
बस पड़ी है तो अपनी अपनी
नहीं तो मूक बधिर समाज बन गया है
मूक बधिर समाज बन गया है ॰॰॰॰
मंजरी
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