मेरा तकिया - एक एहसास
मेरा तकिया
मेरे सिरहाने रखा
वह रूई का एक छोटा-सा पुलिंदा नहीं,
मेरी पूरी उम्र का हमसफ़र है।
जब-जब आँखें छलकीं,
उसने बिना एक शब्द कहे
मेरे आँसुओं को पी लिया।
जब हँसी,
मेरी खिलखिलाहट को
अपनी सिलवटों में संजो लिया।
माँ की डाँट से बच कर छुपने का
पहला ठिकाना वही था।
बाबूजी की झिड़की के बाद
मुझे मनन का अवसर वहीं मिलता ।
मेरे सपनों की पहली उड़ान,
मेरी पहली धड़कन,
पहला संकोच,
पहले क्रश ,
सभी का राज़दार
मेरा अनोखा तकिया ।
विदा हुई तो
माँ से कुछ नहीं माँगा,
बस उसे साथ ले आई,
क्योंकि वह तकिया नहीं,
मेरा पूरा मायका था।
फिर एक दिन
उसकी गोद में मेरा बेटा सोया।
मैं किनारे सरकती गई,
और वह मुस्कुराता रहा।
मुझे भी समझ आ गया था,
मूल से कहीं अधिक प्यारा
सूद होता है।
जब-जब छोटू रूठता,
दौड़कर उसी में मुँह छिपा लेता।
तब जाना,
विरासत केवल ज़मीन नहीं होती,
कुछ विरासतें
रिश्तों की नरम रूई में भी पलती हैं।
आज घर बड़ा है,
कमरे भी बदल गए हैं,
लोग भी अपनी-अपनी राहों पर निकल पड़े हैं।
पर कभी-कभी
मैं उसी पुराने तकिये को
सीने से लगा लेती हूँ।
उसकी सिलवटों में
माँ की थपकी मिल जाती है,
बाबूजी की सीख,
विदाई की भीगी दहलीज़,
और मेरे बच्चे की
दूध-सी महकती नींद।
मैं उससे पूछती हूँ,
"मेरा बच्चा ठीक तो है?"
वह कुछ नहीं कहता।
बस उसकी ख़ामोशी
मेरे माथे को सहला देती है।
तब समझ आता है,
कुछ तकिये
सिर रखने के लिए नहीं होते,
वे पूरी ज़िंदगी को
अपनी गोद में सुलाए रखते हैं।
उनमें रूई कम,
यादें ज़्यादा भरी होती हैं।
और शायद…
इसीलिए वे कभी पुराने नहीं होते।
वे बस… घर बने रहते हैं।
— मंजरी
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