परिचय हिंदी भाषा से !



हिन्दी हमारी मातृ भाषा ही नहीं परंतु हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा था जब हम स्कूल में पढ़ते थे । भले ही कॉन्वेंट में शुरुआत से पढ़े पर हिंदी हमारी बोलचाल की भाषा थी । माँ पापा इंग्लिश और हिंदी ग्रामर पर बहुत ध्यान देते थे । हर गर्मियों की छुट्टियों में wren and martin और हिंदी व्याकरण की किताबों को सिलसिलेवार पढ़ाया जाता था । भाषा हमारी मिश्रित थी -थोड़ी उर्दू ,थोड़ी अंग्रेज़ी  और बहुत सारी हिंदी । 


अवधी और भोजपुरी को सुनकर लहजे में दिख ही जाता था । पिताजी के जल्दी जल्दी तबादलों की शुक्रगुज़ार हूँ की अनेक लहरों से परिचित हुई । शब्दों के तत्त्भव और तत्सम रूप को पहचानने में हिंदी टीचर का बहुत योगदान था । बस अलंकार तो एक दो ही प्रयोग करते थे - अनुप्रास यमक , अतिशयोक्ति और श्लेष । यमक का ‘ कनक कनक ते सौ गुनी मदतकता अधिकाये ‘ ; अनुप्रास का ‘ चारुचन्द्र की चंचल किरणे ‘ …………… 


मेरा सबसे पसंदीदा पीरियड लाइब्रेरी का होता था जो हफ़्ते में एक बार मिलता था । 2 हफ़्ते में एक बार हिंदी भाषा की एक पुस्तक लेना ज़रूरी था । बस यहीं से प्रेमचंद , शरतचंद्र, बंकिमचंद्र, शिवानी, अमृतप्रीतम, जयशंकर प्रसाद , और भी ना जाने कितने प्रभावशाली साहित्यकारों से रूबरू हुए । हाँ पिताजी ने बचपन से ही मेले में होने वाले काव्यसम्मेलन और मुशायरों में पहली पंक्ति में बिठा कर खूब शौक जगाया । आज भी सोचती हूँ क्या ही समझ आता होगा मुशायरों में उस उम्र में पर उन मुशायरों में जाने की दीवानगी अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों जैसे ही थी । पीछे भीड़ का ताली बजाना और सीटियों में अलग ही रोमांच था । वह समय श्री के पी सक्सेना , सुरेंद्र सिंह , बशीर बद्र , राहत इंदौरी , निदा फ़ाज़ली , रघुवीर सहाय , जैसे दिग्गज कवि और शायर को सामने से सुनने का मौक़ा मिला । धन्य हूँ । 


पूर्वी उत्तरप्रदेश में भाषा थोड़ी मीठी और मनुहार भरी होती है , जैसा मैंने देखा और सुना । जैसे जैसे पश्चिम की तरफ़ जाएँ खड़ी भाषा और थोड़ा हरियाणवी लहरा आ जाता है । मिरुत में तबादला हुआ पतिदेव का तो हम सब बोरिया बिस्तर बाँध लखनऊ से वहाँ पहुँच गए । शहर अच्छा लगा । कल्चरल शौक तब लगा जब कोई बोला ‘ हम ‘ मतलब और भी कोई है साथ में तो बोलना पड़ा ‘हम’ का मतलब अकेले हम । हर कोई टोकता ‘हम’नहीं बोलते हैं । किसी को मज़ाक़ में पोछ लिया की की तुमने दावत में ‘जीम’ लिया ? 

भाषा का अंतर उनके चेहरे  पर दिखता तब समझ आया हम भी  भाषा का अपभ्रंश कितना करते हैं । 


स्कूल में अंग्रेज़ी माहौल और घर पर मिश्रित माहौल हमारे भाषा द्वंद को और बढ़ा देता । नौवीं दसवीं से विज्ञान के विद्यार्थी हो गए फिर तो हिंदी ऐसे लगे जैसे ज़बरदस्ती हमारे ऊपर इसको पढ़ा कर अत्याचार हो रहा है । कबीरदास , तुलसीदास के दोहों ने तो हमारे ऊपर बहुत भार लाद दिया था , इसके ऊपर ६-७ पन्नों का निबंध लिखना मानो अति अत्याचार । 


कॉलेज में पहुँचे तो लिखने का जुनून सवार हो गया । होता हैं कोई थोड़ी तारीफ़ कर दे तो मोटिवेशन मिल जाता है । लखनऊ की सरकारी कॉलोनियों में रहने के अपने अलग ही सुख थे। बड़ी-बड़ी हस्तियाँ यूँ ही राह चलते दिख जाती थीं। शिवानी जी रोज़ शाम ठीक छह बजे छड़ी लेकर तेज़ कदमों से टहलने निकलती थीं। आज का ज़माना होता तो शायद उनके साथ सेल्फ़ी लेने की हिम्मत भी जुटा लेते। तस्वीर नहीं मिली, लेकिन वह दृश्य आज भी स्मृतियों में उतना ही स्पष्ट है। डाबर की चौड़ी, साफ़ सड़कों पर घंटों चलते हुए हम अपने सपनों की बुनाई करते रहते। सड़क किनारे खड़े यूक्लिप्टस के ऊँचे-ऊँचे पेड़ भी उन सपनों से छोटे लगते थे, क्योंकि बड़े साहित्यकारों को पढ़ने के बाद प्रेरणा असीम हो जाती है । 


शुरुआत में अंग्रेज़ी में लिखते थे क्यों की कई वर्ष हिंदी का लिखित में प्रयोग सीमित था । सो हमारा शब्दकोश भी अति सीमित रह गया । आज भी द्वंद जारी है इंग्लिश में सोचते हैं फिर हिंदी में लिखते हैं । ऐसा नहीं की अंग्रेज़ी के प्रकांड पंडित हैं । विज्ञान के विद्यार्थी प्रातः सीमित शब्दों से ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं। चाहे वह अंग्रेज़ी हो या हिंदी । 

काव्यालय कुटुंब में आप जैसे मनीषियों का सानिध्य मिला और आदरणीय विनोद सर , जो भौतिकविज्ञानी हैं, से प्रोत्साहन मिला और लिखने का उत्साह मिला । 

द्वन्द जारी है मिश्रित भाषा का प्रयोग भी परंतु यही समझ आया बोलचाल की भाषा जिसमें अपभ्रंश भी हैं, हमारी बात आप तक पहुँचा रही है साथ ही शब्द संयोजन अच्छा भी प्रतीत हो रहा है , वही भाषा है । 

इतना लिखने की हिमाक़त कर पायी हूँ , यही मेरी जीत है । 

मंजरी 🙏

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