बाबूजी
बाबू जी!
“अब तो हमारा समय आ गया। ईश्वर भी न जाने क्यों नहीं सुन रहे। चल रविन्द्र, तू भी चल।”
बाबू जी के मुँह से इतना सुनना था कि रविन्द्र के तो होश ही उड़ गए। वह लगभग दौड़ता हुआ कमरे से बाहर निकल गया और अगले दो घंटे तक बाबू जी की नज़रों से बचता रहा, मानो डर हो कि कहीं बाबू जी सचमुच उसे पकड़कर अपने साथ यमलोक न ले जाएँ!
हम सबका हँसते-हँसते बुरा हाल था। थोड़ी देर बाद रविन्द्र हमारे पास आकर शिकायत करने लगा,
“देखो तो! बाबू जी इस जवानी में ही मुझे यमलोक ले जाने के पीछे पड़े हैं!”
और बाबू जी? चेहरे पर वही मासूमियत, जैसे उन्होंने कोई साधारण-सी बात कही हो।
हर सुबह हमारे नब्बे साल के बाबू जी के लिए एक नया दिन ही नहीं, एक नया फ़ितूर लेकर आती थी।
कभी फरमान होता,
“चलो गाँव चलते हैं, देख तो आएँ। किरायेदारों से किराया भी तो लेना है।”
फिर तुरन्त सफाई,
“तुम नहीं समझोगी बहू, हमें साइन करने पड़ते हैं और पर्ची भी काटनी पड़ती है।”
नब्बे साल की उम्र में भी नियम-कानून के इतने पक्के कि इनकम टैक्स भरने में भी कोई कोताही मंज़ूर नहीं थी। उम्र शरीर की बढ़ी थी, जिम्मेदारियों की नहीं!
कभी मन की बात न मानो तो खाने की मेज़ पर मुँह फुलाकर बैठ जाते। और तब तक नहीं उठते जब तक उनकी बात मान न ली जाए। शरीर भले ही पुराना पड़ गया था, पर दिमाग अभी भी चुस्त-दुरुस्त है । किसी का ज़िक्र छिड़ जाए तो उसके पुरखों तक का पूरा खानदान सामने रख देते।
और खाने की बात हो तो उनकी स्मरणशक्ति तो कमाल की है ।
“गुलाबजामुन में इतने किलो खोए में इतनी मैदा पड़ती है…”
यह ज्ञान हमें ऐसे दिया जाता, जैसे देश की कोई अत्यंत गोपनीय रेसिपी हमारे सुपुर्द की जा रही हो।
तबीयत खराब होने पर अगर आधी रोटी कम खा लेते तो तुरन्त शिकायत,
“बहू, हमारी खुराक कम हो गई है।”
और अगले ही पल दार्शनिक निष्कर्ष,
“हम जी रहे हैं तो बस अच्छा खाने के लिए। भगवान अब हमें ऊपर बुला लें।”
अर्थात् जीवन का सार स्पष्ट था, खाना है तो जीना है, और अच्छा खाना है तो और भी जीना है!
एक दिन बोले,
“कोई मेहमान घर पर आए तो रसोई में मत खटा करो। बाहर होटल में खाना खिला दिया करो, सस्ता पड़ता है।”
हम भी समझ गए, बात सस्ते की कम और चटखारे की ज़्यादा है।
बाबूजी के नाती विदेश में पढ़ाई कर रहे थे । बड़ा गर्व था । सबको सुनाते , आस पड़ोस के अंकल बहुत बोर हो जाते । कई बार तो उन यूनिवर्सिटी की गूगल रैंकिंग भी साथ में चिपका देते । सुनाने का शौक था सुनते थोड़ी ना हैं सेठ जी ।
एक रात तबीयत थोड़ी खराब लगी तो दवाई खाकर सो गए। रात करीब एक बजे उठे और बड़े इत्मीनान से बोले,
“चलो, खाने की मेज़ पर चलें।”
मैंने सोचा, शायद भूख लगी होगी। जो रात का खाना बना था, वही रायते के साथ परोस दिया।
खाना खत्म करके बोले,
“अब सोफे पर बैठेंगे, वहीं कॉफ़ी पिएँगे।”
मैंने समझाया कि रात बहुत हो गई है, यहीं बैठिए ।
पर बाबू जी अपनी बात पर अडिग,
“कॉफ़ी तो सोफे पर बैठकर ही पिएँगे। और अगर उठ न पाएँ तो ज़रा सहारा दे देना। उठ भी जाएँगे!”
कॉफ़ी खत्म हुई तो अगला आदेश आया,
“अब कढ़ी-चावल दोपहर के खाने में खाएँगे। क्या तुम्हारी खाने वाली अभी तक नहीं आई?”
तब जाकर मेरी समझ में आया कि बाबू जी की घड़ी में अभी सुबह ही चल रही थी!
मैंने किसी तरह समझाया,
“पापा, रात हो गई है। रात के ढाई बज रहे हैं। अब चलिए, सो जाइए।”
समय का भ्रम था या खाने का उत्साह, यह आज तक तय नहीं हो पाया।
रोज़ सुबह एक नया किस्सा, एक नई फरमाइश।
“आज तुम कमज़ोर लग रही हो, बादाम का हलवा खा लो।”
अब यह अलग बात थी कि हलवा बनना किसके लिए है, यह बाबू जी को खूब पता रहता है !
यानी जो खाना है, उसे बनवाने के लिए नए-नए बहाने तलाशना भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। और हम भी कहाँ पीछे रहने वाले थे। उनकी फरमाइशों को बहाना बनाकर तरह-तरह के व्यंजन बनाते और उन्हें बड़े प्यार से खिलाते।
बाबू जी की भूख शायद उम्र से बड़ी है और हमारी खुशी उनकी भूख से।
बाबूजी की प्यारी बिटिया में उनकी जान बसती । शाम को पहला फ़ोन उनको जाता । पहले तो हाल चाल पूछते फिर नोक झोंक । उनको खूब चिढ़ाते और दीदी भी उनसे जम कर माथा पच्ची करतीं । इधर एक साल से फ़ोन कम करते हम सबको। एक दिन दीदी ने फ़ोन किया तो छोटी बहू समझ कर 5 मिनट बात करते रहे फिर जब समझाया की दीदी हैं तो फ़ोन रख दिया बोले तो तुम बात कर लो बेटा दीदी से। तब से दीदी का मूड उखड़ गया । मेरी तो कोई परवाह ही नहीं है पापा को। हम भी हँसते रहते हैं । पापा और उनकी लाडली की नोंक झोंक देख कर I
अड़तीस साल के रविन्द्र और नब्बे साल के बाबू जी की दोस्ती भी बड़ी विचित्र है । एक पल एक-दूसरे के बिना मन नहीं लगता और अगले ही पल दोनों में मनमुटाव!
बाबू जी को रविन्द्र के बिना चैन नहीं था और रविन्द्र को बाबू जी की डाँट के बिना।
एक दिन बाबू जी ने धमकाते हुए कहा,
“तुझे डॉक्टर साहब ने मेरी सेवा के लिए रखा है। मेरी बात माना कर!”
रविन्द्र खिसियाकर हमारे पास शिकायत करने आ जाता। लेकिन कुछ देर बाद वही रविन्द्र उनकी बगल वाली कुर्सी पर बैठा मिलता और दोनों मिलकर ठहाके लगा रहे होते।
हाँ, खाने की मेज़ पर एक नियम अटल था, रविन्द्र की थाली सबसे पहले सजनी चाहिए। वरना उसके बाद हमारी शामत तय है ।
दिल्ली जाने के नाम से ही बाबू जी की तबीयत खराब होने लगती। बड़ी मुश्किल से तैयार होते और जाते भी तो एक ही शर्त पर,
“बस एक हफ़्ता रुकेंगे।”
क्यों न हों परेशान! वहाँ बात करने वाला कोई नहीं था। अकेलापन उन्हें भीतर से खाता था और शायद इसीलिए खाने में भी उन्हें अपना साथी मिल गया।
नाती-पोते अपनी आगे की पढ़ाई के लिए उड़ चुके थे। बड़ी-सी कोठी और उसमें हम मात्र तीन प्राणी।
हम सब अपने-अपने तरीके से अकेलेपन के शिकार थे। फर्क बस इतना था कि हमने उसके साथ रहना सीख लिया था और बाबू जी उससे रोज़ थोड़ी-सी लड़ाई लड़ते थे।
बड़ी बहू बाबू जी की सबसे प्रिय है । धीर-गंभीर स्वभाव और धैर्य—मानो उनके पास असीमित स्टॉक हो!
खानदान की पूरी पंचायत सुबह के नाश्ते पर ही बैठती थी। किसकी क्या खबर है, किसके घर क्या हुआ, किस नाती का जन्मदिन है—सब पर विस्तार से चर्चा।
नाती का जन्मदिन हो तो खीर से लेकर पूरा मेन्यू चार दिन पहले से तय होना शुरू हो जाता।
कभी बड़ी बहू उनकी अनगिनत फरमाइशें सुनकर खिसिया जातीं, लेकिन थोड़ी देर बाद वही फरमाइश पूरी करने में जुटी मिलतीं।
कभी-कभी लगता, बाबू जी का असली ‘सुख’ हम दोनों बहुओं से ही था। बेटों के पास अपनी व्यस्तताएँ थीं, लेकिन हम दोनों के पास उनकी बातें सुनने का समय था।
और बाबू जी को बातें करने का पूरा अधिकार!
शाम के सात बजते-बजते फ़ोन आ जाता—
“बेटा, कैसी हो? हमारे नाती ठीक हैं? पढ़ाई कैसी चल रही है? रिसर्च का काम आगे बढ़ा?”
रोज़ वही सवाल और हमारा वही जवाब—
“हाँ पापा, सब ठीक है।”
धीरे-धीरे हमारे सखी-सहेलियों को भी उनके फ़ोन की आदत हो गई थी। कभी सात बज जाएँ और फ़ोन न आए तो पूछ बैठते,
“क्या हुआ? आज सात बज गए, बाबू जी का फ़ोन नहीं आया?”
एक बार बाबू जी बहुत बीमार थे और दवा खाने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मैं धीरे से बड़ी बहू से बोली—
“भाभी, इस बुड्ढे को कैसे समझाएँ?”
मेरी बात शायद बाबू जी ने सुन ली।
अचानक उनके पोपले मुँह से ऐसी खिलखिलाहट निकली कि हम दोनों पहले तो सकपका गए, फिर उनकी वह निश्छल, प्यारी-सी हँसी देखकर खुद भी मुस्कुराने लगे।
वह हँसी आज भी कानों में गूँजती है।
अनगिनत किस्से उनके साथ, रूठना, मनाना, डाँटना, शिकायतें, फरमाइशें, रविन्द्र से झगड़े, खाने की योजनाएँ और हमारी छोटी-छोटी बहसें।
उस समय कभी-कभी लगता , बस, बाबू जी की फरमाइशें कुछ कम हों और थोड़ा चैन मिले।
आज सोचती हूँ तो लगता है,
वह शोर ही तो घर की आवाज़ है ।
उनकी डाँट में अपनापन है , उनकी शिकायतों में अधिकार है , उनकी फरमाइशों में जीवन से प्रेम है और उनकी हँसी में पूरे घर की रौनक।
अब कभी-कभी मन सचमुच पूछ बैठता है,
इतने सारे किस्से, इतनी सारी आवाज़ें, इतनी सारी फरमाइशें…
इस अपनेपन को अब कहाँ से ढूँढेंगे?
बाबू जी,
आप तो कहकर चले चले जायेंगे ,
“अब हमारा समय आ गया…”
पर हमसे यह कौन कहेगा कि सुबह क्या बनाना है, रात के ढाई बजे कढ़ी-चावल क्यों चाहिए और रविन्द्र की थाली सबसे पहले क्यों लगनी चाहिए?
और हाँ…
बाबू जी, चलिए… हम भी साथ चलें।
उम्र तो अब हमारी भी हो चली है,
बस दिल अभी भी उसी घर में अटका है
जहाँ आपकी आवाज़ आती है ,
“बहू… आज खाने में क्या बना है? हमारे नाती ठीक तो हैं ?”
मंजरी 🩷🩷🙏
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